Tuesday, March 24, 2026
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    मैंने तो बस प्रेम जिया है-डा. नीलिमा पाण्डेय

    मैंने तो बस प्रेम जिया है।
    जिससे कष्ट अपार मिला है ।

    बचपन बीता,यौवन बीता,
    कृष्ण – कृष्ण ही टेरा है।
    छोड़ घराना,कृष्णमयी हो,
    तुलसी माला, फेरा है ।
    सजा मिली औ जहर पिया है।
    मैंने तो बस प्रेम जिया है।

    पुष्पों की थी,घनी वाटिका,
    मांगा प्रियतम,पूज देविका।
    वन-वन भटकी,संग प्रभु के,
    साथ रही बन एक सेविका ।
    कनक मृगा ने छल भी किया है!
    मैंने तो बस प्रेम जिया है।

    मैंने तो बस प्रेम जिया है।
    जिससे कष्ट अपार मिला है।

    डा. नीलिमा पाण्डेय,मुंबई

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